आधुनिकता के बाद भी रिश्तों में कैसे DISTANCE हुए कम और बढ़ा प्यार

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सुमन वाजपेयी:

यह सच है कि विकास और आधुनिकता की तीव्र लहर ने सबसे ज्यादा असर अगर किसी पर डाला है तो वे हैं हमारे आपसी रिश्ते पर. आप बेशक इनमें नकारात्मकता ढूंढे लेकिन ध्यान से देखें तो पता चलेगा कि रिश्तों के बीच जो एक समय में जो Distance हुआ करती थीं, वे कम हो गई हैं और किसी-किसी रिश्ते में तो खत्म ही हो गई हैं.

सोच के ग्लोबल होने के साथ-साथ पति-पत्नी, भाई-बहन, सास-बहू, ससुर-बहू, मां-बेटी, पिता-पुत्र/पुत्री-कहने का अर्थ यह है कि हर तरह के पारंपरिक रिश्ते में एक बदलाव आया है. यह बदलाव नकारात्मक नहीं है, सकारात्मक भी है.

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एक जमाना था जब बच्चों के लिए, खासकर बेटे के लिए पिता किसी तानाशाह से कम नहीं होते थे. बेटे के कोई बात अपने पिता तक पहुंचानी होती थी तो वह मां के माध्यम से पहुंचाता था. पिता-पुत्र के बीच एक संवादहीनता की स्थिति ही कायम रहती थी और बेटी भी पिता से डर के कारण एक Distance बनाकर चलती थी.

इस रिश्ते में एक बहुत ही प्यारा बदलाव देखने को मिल रहा है. बच्चे अपने पिता से अब दूरी बनाकर नहीं चलते, वरन एक मित्रवत व्यवहार उनके बीच कायम हो गया है. वे अपनी हर बात पिता से शेयर करने लगे हैं.

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सास-बहू का रिश्ता एक ऐसा रिश्ता है, जिसे लेकर सबसे ज्यादा भयभीत दोनों ही पक्ष के लोग रहते थे. बहू को सास के नाम से डर लगता था और सास को बहू के अस्तित्व से. लेकिन अब न तो टिपीकल सास का ही जमाना रहा है और न ही सास के दबदबे को चुनौती देने वाली बहू का.

सुमन वाजपेयी

शिक्षित और वर्किंग सास न सिर्फ अब बहू को अपनी तरह से जीने की आजादी देती है, वरन उसके साथ हर तरह से एडजस्ट करने की कोशिश भी करती है. बहू भी सास को अपनी मां की तरह ट्रीट करने लगी है.

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पति-पत्नी के रिश्ते में जो बदलाव आया है, उसने तो वैवाहिक समीकरणों को भी परिर्वितत कर दिया है. पति अब पत्नी पर डोमीनेट नहीं करता, न ही उसे अपने से कमतर समझता है. अब पति घर के कामों में तो पत्नी को सहयोग देता ही है, साथ ही बेबी सिटिंग भी करता है.

आपसी रिश्तों में अब पहले की तरह घुटन नहीं रही है, बल्कि दोनों एक-दूसरे को स्पेस देते हैं. पति अपनी पत्नी के काम से जुड़ी कमिटमेंट्स को समझता है. इस रिश्ते में अब अंडरस्टैंडिंग, कंप्रोमाइज और कोपरेट करने का भाव समाहित हो गया है. यही कारण है कि पति-पत्नी अब दोस्तों की तरह व्यवहार करने लगे हैं.

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भाई-बहन के रिश्ते में हालांकि सदा ही एक मधुरता रही है, पर फिर भी बहनें भाई से डरा करती थीं. लेकिन वक्त के साथ इस रिश्ते में अब खौफ की जगह ले ली है मित्रता ने. भाई-बहन भी अब फ्रेंड्स ही बन गए हैं. वे एक-दूसरे के साथ अपनी सारी बातें शेयर करते हैं.

दोस्ती के रिश्ते में पहले जहां काफी सीमाएं हुआ करती थीं, उसमें अब व्यापक परिवर्तन आ गया है. केवल पुरुष-पुरुष ही नहीं, स्त्री-पुरुष की दोस्ती में भी चेंज आया है. चैटिंग, पार्टी और साथ घूमना आम बात हो गई है. इस खुलेपन की वजह से जहां संकीर्णता पर उन्होंने प्रहार किया है वहीं दूसरी ओर इन रिश्तों के बीच व्याप्त हिचक टूटने से बहुत सारी परेशानियां भी कम हुई हैं.

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तमाम पारंपरिक रिश्तों में आए बदलाव का प्रभाव पोजीटिव ही हुआ है, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता है. रिश्तों में आए खुलेपन ने सीमाएं तोडऩे को विवश किया है जिससे मर्यादाएं आहत हुई हैं. हमारी संवेदनशीलता में कमी आई है जिसकी वजह से लोग एक-दूसरे को टेक इट फार ग्रांटेड लेने लगे हैं.

सहज होना अच्छा है, पर इतना नहीं कि उससे दूसरे की भावनाएं आहत हों. रिश्ता चाहे जो हो, वह अत्यधिक नाजुक और संवेदनशील होता है. केवल निभाना ही नहीं उसे संभालना भी आवश्यक है.

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