महिला सशक्तिकरण का अर्थ पुरुषों से प्रतिस्पर्धा करना नहीं -CHITRA MUDGAL

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Chitra Mudgal
Chitra Mudgal

सुमन बाजपेयी

आजकल महिला सशक्तिकरण को लेकर कई तरह के सवाल और कयास लगाए जा रहे हैं. महिलाएं निरंतर अपने अधिकारों के लिए लड़ रही हैं, ताकि पुरुषों की बराबरी कर, उनकी एक कंपीटीटिव की तरह बन सकें. प्रसिद्ध साहित्यकार Chitra Mudgal मानती हैं कि बस मानो यहीं कुछ ऐसा हो रहा जो नहीं होना चाहिये.




महिलाओं की यह मुखरता कहीं न कहीं एक स्वच्छंदता व उडंदता का रूप शायद लेने लगी है, और तब एक ही बात समाज करता है कि आखिर वह इस तरह कौन सा महिला सशक्तिकरण हासिल करना चाहती हैॽ यह कैसी स्वतंत्रता है जो उसे पुरुषों से होड़ करने की ओर धकेल रही हैॽ




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वुमनिया से खास बातचीत में महिला सशक्तिकरण की व्याख्या करते हुए चित्रा मुद्गल कहती हैं कि स्त्री के बुनियादी सामाजिक अधिकारों के साथ-साथ अपनी चेतना की अभिव्यक्ति की स्पेस अर्जित करना ही महिला सशक्तिकरण की व्याख्या है क्योंकि बुनियादी अधिकारों में वे सब आ जाते हैं जो उसे चाहिए.




जब तक निर्णायात्मक क्षमता यानी जब तक कि उसे अपनी चेतना का इस्तेमाल करने का स्पेस नहीं मिलेगा, तब तक चेतन मानवीय के रूप में समाज में वह अपना मुकाम नहीं बना सकती. या समाज ही उसे ऐसा करने का अधिकार नहीं देगा और जब तक उसे यह अधिकार नहीं मिलेगा, वह लड़ती रहेगी और इसे महिला सशक्तिकरण का नाम दिया जाता रहेगा.

सुमन बाजपेयी

वे कहती हैं कि विडंबना तो यह है कि अपनी क्षमताओं के बावजूद कार्यस्थल पर वह एक देह के रूप में देखी जाती है, इसलिए देह से ऊपर उठकर एक स्वतंत्र ईकाई के रूप में उसे स्वीकारा नहीं जाएगा. वह इस पितृसत्तात्मक समाज के विरुद्ध परचम लहराए खड़ी ही रहेगी.

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उनका मानना है कि महिला सशक्तिकरण की लड़ाई को अभी भी संतुलित व विवेकपूर्ण होकर लड़ा जाना चाहिए क्योंकि  पितृसत्तात्मक समाज का प्रतिद्वंद्वीं बनकर अधिकारों की मांग करना गलत है. उस समाज का अनुकरणीय बनने से उसे बचना चाहिए.

चित्रा मुद्गल का मानना है कि पुरुष की तरह सारी उदंडता, सारी सीमाएं तोड़ते हुए अधिकार पाना ठीक नहीं है. जब वह पुरुष को चुनौती देती है तो वह उसे और उदंड बनाती है और तब पुरुष को लगता है कि वह उसे जिन नियमों का पालन करने के लिए कहती है, उसे वह स्वयं कैसे तोड़ सकती है?

क्या उसके लिए किसी गली में खड़े होकर पैंट खोलकर पेशाब करना ठीक होगाॽ उसकी प्रतिक्रिया कि तुम अगर ऐसा कर सकते हो तो मैं क्यों नहीं, कहीं से भी उचित नहीं है. सीमोन बोउवार ने कहा है कि स्त्री पैदा नहीं होती, स्त्री बनाई जाती है.

मेरी नजरों में स्त्री, स्त्रीत्व एक बहुत गहन अर्थ रखने वाले शब्द हैं और बराबरी हासिल करने के लिए उसका टिट फॉर टैट का नजरिया उसे महिला सशक्तिकरण की राह से भटका सकता है.

स्त्री और स्त्रीत्व के गौरव को लेकर वह जो आंदोलन कर रही है, वह इस तरह के आचरण से जिसमें से केवल एक खुलापन और प्रतिस्पर्धा की मानसिकता लगती है, पथभ्रष्ट हो जाता है. जब तक किसी भी सोच में संतुलन नहीं होगा, तब तक महिला सशक्तिकरण के प्रयास पूर्णतया कभी सफल नहीं हो पाएंगे.   

 

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