क्या ऐसे मामलों में भी ABORTION की इजाजत नहीं मिल सकती?

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दस साल की एक बच्ची से उसका एक रिश्तेदार लगातार सात महीनों तक ‘गंदा खेल’ खेलता रहा. अब वो बच्ची अपने पेट में 26 हफ्ते का गर्भ लेकर अदालत पहुंची है. उसकी मांग है कि उसे गर्भपात की इजाजत दी जाए क्योंकि डॉक्टरों के मुताबिक उसका शरीर इस बच्चे को जन्म देने के लायक नहीं है और डिलीवरी से पैदा होने वाले बच्चे और मां दोनों की जान को खतरा है .

दिल को दहला देने वाली इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रहा है और उसने बच्ची के मेडिकल परीक्षण का आदेश दिया है कि उसके  26 सप्ताह के गर्भ को गिराने से क्या- क्या खतरे हो सकते हैं. चंडीगढ़ की इस दस साल की बच्ची से उसका एक करीबी रिश्तेदार सात महीने से ये गंदा खेल कर रहा था और किसी को घर में ख़बर भी नहीं लगी .यह घटना उन सब लोगों के लिए भी है जो अपने बच्चे –बच्चियों को करीबी लोगों के भरोसे आंख मूंद कर छोड़ देते हैं.




छोटे बच्चों के साथ यौन अपराध के ज़्यादातर मामलों में उनके करीबी रिश्तेदार मित्र या पड़ोसी शामिल होते हैं. इस बच्ची के साथ हुई ज्यादती का पता तब चला जबकि उसने पेट दर्द की शिकायत की और उसे लोकल अस्पताल ले जाया गया.

बच्ची का Abortion कराने के लिए लोकल कोर्ट में अर्जी दाखिल की गई तो उसने इसे दो आधार पर खारिज कर दिया, पहला एबार्शन को लेकर बने कानून के मुताबिक सिर्फ़ बीस सप्ताह तक के गर्भ पर ही एबार्शन कराया जा सकता है और दूसरा एबार्शन कराने पर बच्ची को गंभीर मानसिक परेशानी या ट्रॉमा को झेलना पड़ सकता है. अब कुछ संगठनों ने इस पर सुप्रीम कोर्ट में दरवाज़ा खटखटाया. बच्ची को मेडिकल चैकअप 26 जुलाई को होगा और अब 28 जुलाई को  अदालत इस पर फैसला सुनाएगी.




मौजूदा मेडिकल टर्मिनेंसी एक्ट के तहत 20 सप्ताह तक ही एबार्शन कराया जा सकता है. इस कानून में बदलाव की मांग काफी समय से चल रही है और इसे 20 से बढ़ाकर 28 सप्ताह किया जाने पर दबाव है. संसद में ये संशोधन बिल जून 2014 से लटका हुआ है ,लेकिन इस पर बात अभी आगे नहीं बढ़ी है.

सुप्रीम कोर्ट में इस याचिका पर नेशनल वीमन कमीशन, द फैडरेशन ऑफ ऑब्स्ट्रेशियन्स एंड गॉयनोकॉलोजिस्ट्स ऑफ इंडिया और कई दूसरे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगठन साथ हैं. अक्सर देखा जाता है कि सरकारें और राजनीतिक दल महिलाओं से जुड़े मसलों पर ना तो तेजी दिखाते हैं और ना ही गंभीरता बरतते हैं.




Womenia सरकार और सभी राजनीतिक दलों से अपील करता है कि वह इस संशोधन बिल पर जल्दी से जल्दी विचार कर के नया कानून ले कर आए ताकि खासतौर से बलात्कार पीड़ित लड़कियों और बीमार महिलाओं को राहत मिल सके.

आपकी नज़र में भी अगर कोई ऐसा मामला है तो हमें ज़रुर बताएं, हम उसे सरकार तक पहुंचाने की कोशिश करेंगें.