ANANDI SANITARY NAPKIN-जिसने दिया है झूंझनू की महिलाओं को स्वस्थ रहने का मंत्र

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प्रतिभा ज्योति:

एक तरफ जहां देश के कई स्कूलों में लड़कियों को अभी भी साफ-सुथरे टॉयलेट नहीं मिलते वहां सैनटरी नैपकिन की बात कौन करे? लेकिन राजस्थान का झुंझुनू एक ऐसा जिला बना गया है जहां 90फीसदी स्कूलों में लड़कियों को सैनटरी नैपकिन मिल रहा है. यह कोशिश रंग लाई है महिलाओं के लिए सस्ते सैनेटरी नैपकिन बनाने वाली Unit के कारण जहां तैयार होता है Anandi Sanitary Napkins.




इस यूनिट को तैयार किया गया है राजस्थान के महिला अधिकारिता विभाग की पहल पर. विभाग के असिस्टेंट डाइरेक्ट विप्लव न्योला ने पहले अमृता फेडरेशन सोसाइटी नाम के एक स्वंयसहायता समूह का गठन किया और इस यूनिट का संचालन वे अपनी देखरेख में करवा रहे हैं.

विप्लव न्योला , असिस्टेंट डाइरेक्टर

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इस सोसाइटी की स्थापना मई 2014 में की गई. शुरुआत में इस स्वंय सहायता समूह के साथ केवल 2000 महिलाएं जुड़ीं थीं लेकिन अब यह संख्या बढ़कर क़रीब 19हजार हो गई है. सैनटरी नैपकिन यूनिट खुलने के कारण समूह के पास साढ़े छह करोड़ का फंड जमा हो गया है.




वुमनिया की टीम ने 4 जनवरी को यूनिट का दौरा किया और यह जानने की कोशिश की किस तरह सैनटरी नैपकिन बनाने वाली इस यूनिट ने झूंझनू जिले में एक क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया है. पहले जहां महिलाएं माहवारी और सैनटरी नैपकिन के नाम पर शर्म से अपनी गर्दन छुपा लेती थीं अब वे खुलकर इस विषय पर बोलने लगी हैं.

Womenia की एडिटर प्रतिभा ज्योति झुंझुनू में महिलाओं के साथ




पहले झूंझनू में महिलाओं की 50 फीसदी आबादी पीरियड में कपड़ा यूज करती थीं. उनमें से 25फीसदी एक ही कपड़ा लगातार लेती थीं लेकिन अब घर-घर तक आसानी से ‘आनंदी’ के पहुंचने से अब अधिकांश महिलाएं इसका ही इस्तेमाल करने लगी हैं.  इससे उन्हें सेहतमंद रहने का एक मंत्र मिल गया है.

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विप्लव न्योला ने हमारी टीम को बताया कि झूंझून के 90 फीसदी स्कूलों में अब लड़कियों को यह सैनटरी नैपकिन हमेशा मिलता है. पहले केवल सरकारी स्कूलों में ही मिलता था लेकिन जागरुकता अभियान के कारण अब प्राइवेट स्कूलों में भी यह मिलने लगा है. उन्होंने बताया कि फर्स्ट एड बॉक्स में नैपकिन को रखना स्कूलों में अनिवार्य कर दिया गया है.

Anandi Sanitary Napkinsफरवरी 2017 में शुरु हुए इस यूनिट में केवल महिलाएं ही काम करती है. ‘आनंदी सैनटरी नैपकिन’ को घर-घर हर महिला तक पहुंचाने यानी मार्केटिंग का काम भी वे खुद ही करती हैं. इसकी कीमत बाजार में मिलने वाले नैपकीन से 6 रुपये कम है.

यहां काम करने वाली संतोष और बबली बताती हैं कि पहले जब उन्होंने यहां काम करना शुरु किया तो लोग कहते थे कि क्या गंदा काम करती हो, लेकिन अब यही काम उनकी पहचान बन गया है. अब घर-घर में महिलाएं उनका बनाया नैपकिन इस्तेमाल कर रही हैं.

संतोष कहती हैं कि अब तो मैं खुद भी इसे यूज करती हूं और अपनी बेटियों को भी देती हूं. कई बार रिश्तेदारों के यहां कोई प्रोग्राम होता है तो वहां की महिलाओं के लिए भी ले जाती हूं.

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इस यूनिट में काम करने वाली महिलाओं को नैपिकन बनाने की ट्रेनिंग दी गई है. वे एक दिन में हजार पैड बनाने की कोशिश करती हैं. एक पैकेट में 8 नैपकिन होता है. पैकेट की कीमत 25 रुपए रखी गई है.

Anandi Sanitary Napkinsविप्लव न्योला बताते हैं कि अभी झूंझनू में हर महीने सैनेटरी नैपकिन की डेढ़ लाख पैकेट की डिमांड है, लेकिन हम इसे पूरी नहीं कर पा रहे हैं. कोशिश जारी है कि जल्दी ही इस डिमांड को पूरी कर सकें.

‘आनंदी’ नैपकिन को आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के जरिए घर-घर पहुंचाया जाता है. क़रीब 300 बड़े बैगों में भरकर नैपकिन को आंगनबाड़ी कार्यकर्ताएं घर-घर में जाकर बेचती हैं.

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