DR. ANANDI GOPAL JOSHI के पति की एक जिद ने कैसे बदल दी उनकी जिंदगी?

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Anandi Gopal Joshi
India's first female doctor, google celebrates birthday

भारत की पहली महिला Dr. Anandi Gopal Joshi भी एक बालिका बधू थीं. हम कलर्स टीवी पर दिखाए गए बालिका बधू के आनंदी की बात नहीं कर रहे. बल्कि उस आनंदी गोपाल जोशी की बात कर रहे हैं जिन्हें भारत की पहली महिला डॉक्टर बनने का गौरव हासिल हुआ.

Anandi Gopal Joshi
Dr. Anandi Gopal Joshi

उनकी 153वीं जयंती पर गूगल ने डूडल बनाकर उन्हें श्रद्धांजलि दी है. डूडल में  आनंदी गोपाल जोशी के हाथ में डिग्री और गले में स्टेथोस्कोप डाले दिखाया गया है.  वे 1886 में महज 19 साल की उम्र में अमेरिका से डॉक्टर की डिग्री के साथ भारत लौट आई थीं. उनके पति ने उन्हें डॉक्टरी पढ़ने के लिए अमेरिका भेजा था.

जिस तरह डॉ आनंदी गोपाल जोशी को पहली भारतीय महिला डॉक्टर होने का गौरव मिला उसी तरह उनके पति ने भी इस बात का इतिहास रचा कि किसी व्यक्ति ने अपनी पत्नी को डॉक्टर बनने के लिए पहली बार विदेश भेजा था. यह उस जमाने की बात है जब लड़कियों को पढ़ाने-लिखाने के बारे में सोचा ही नहीं जाता था.




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पढ़ाई के लिए आनंदी गोपाल जोशी का विदेश जाना तो बेहद ही क्रांतिकारी कदम था. जोशी जब अमेरिका से लौंटी तो उनके मन में महिलाओं के लिए एक मेडिकल कॉलेज खोलने का सपना था. लेकिन भाग्य ने उनका साथ नहीं दिया और भारत लौटने पर टीबी जैसी बीमारी से ग्रसित होकर काफी बीमार रहने लगी थीं.




पुणे में जन्‍मी आनंदीबाई जोशी का जन्म 31 मार्च 1865 को एक परंपरागत ब्राह्मण परिवार में हुआ था. उनकी शादी केवल नौ साल की उम्र में उनसे करीब 25 साल के बड़े गोपालराव जोशी से हुई थी. जिस समय उनकी शादी हुई उन्हें अक्षर ज्ञान भी नहीं था.

लेकिन पति ने ठान लिया था कि वे आनंदी को शिक्षा दिलाएंगे. उपन्यास ‘आनंदी गोपाल’ मराठी साहित्य में ‘क्लासिक’ माना जाता है और इसका अनुवाद कई भाषाओं में हो चुका है. उपन्यासकार श्री. ज. जोशी ने उपन्यास ‘आनंदी गोपाल’ में लिखा है-

गोपाल को ज़िद थी कि अपनी पत्नी को बहुत पढ़ाऊं. अपनी जिद पूरी करने के लिए उन्होंने पुरातनपंथी ब्राह्मण-समाज का तिरस्कार झेला. उन्होंने आनंदी के साथ शादी की शर्त यही रखी कि वे जरुर पढ़ेंगी. हालांकि आनंदी को पढ़ाई से खास लगाव नहीं था.  लेकिन गोपालराव ने कभी प्यार तो कभी डांट से आनंदी को समझाया.

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धीरे-धीरे आनंदी में पढ़ाई के प्रति इच्छा जागी. गोपालराव जितनी किताबें लाकर देते वे सब पढ़ जातीं. आनन्दी ने 14 साल की उम्र में एक लड़के को जन्म दिया, लेकिन उचित चिकित्सा देखभाल की कमी के कारण बच्चे की जल्दी मौत हो गई.




कहा जाता है कि बच्चे की जुदाई ने मां आनंदी की जिंदगी में एक अहम मोड़ ला दिया जिससे उनकी डॉक्टर बनने के प्रति उनकी रुचि जागी. इसके बाद गोपालराव ने आनंदी को उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए प्रोत्साहित किया और 16 साल की उम्र में उन्हें अमेरिका भेज दिया.
अमेरिका लौटने के बाद टीबी की बीमारी के कारण आनंदी की सेहत में गिरावट आती गई और 26 फरवरी 1887 को 22 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया. उनके जीवन पर कैरोलिन वेलस ने भी 1888 में बायोग्राफी लिखी. इसी पर  ‘आनंदी गोपाल’ नाम से सीरियल बना और उसका प्रसारण दूरदर्शन पर भी किया गया.
आनंदी उन लाखों महिलाओं के लिए आदर्श बन गई हैं जो या तो अपनी क्षमताओं को पहचान नहीं पाती हैं या पहचान ही पाएं तो उसे उचित अवसर नहीं दे पातीं. आज हम हॉस्पिटल में महिला डॉक्टर और नर्सों को देखते हैं यह बात सामान्य लगती है लेकिन जिस समय आनंदी डॉक्टर बनीं वे महिलाओं के लिए मिसाल स्थापित कर दिया.

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