AADHI AABADI: क्या स्त्री अपने मन से छोड़ती है नौकरी?

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Aadhi Aabdi
why do women quit their jobs( Pik Courtesy: Gender Women)

सोनाली मिश्र:
लेखिका और पत्रकार:

हाल ही में एक खबर ने सबका ध्यान अपनी तरफ खींचा है, यह खबर सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही हो सकती है. हर खबर के दो पहलू होते हैं, इस खबर के भी हैं. यह खबर चूंकि Aadhi Aabadi के सरोकारों से जुड़ी है तो यह अधिक ध्यान दिए जाने योग्य है.




भारत में एक तरफ जहां शिक्षा के क्षेत्र में महिलाओं की संख्या में वृद्धि हो रही है, वहीं दूसरी तरफ नौकरी छोड़ने वाली स्त्रियों की संख्या में भी बढ़ रही है. भारत में इस समय केवल 27 प्रतिशत ही महिलाएं नौकरी कर रही हैं.

ऐसे में बहुत आश्चर्य होता है कि एक तरफ तो जहां नज़र फैलाते हैं, वहां पर स्त्रियां ही स्त्रियां नज़र आती हैं. लगभग हर परीक्षा में लडकियां भी अव्वल रहती हैं, मगर फिर आंकड़े? क्या ये आंकड़े भ्रामक हैं?




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क्या ये आंकड़े ऐसे हैं जिनपर भरोसा नहीं किया जाना चाहिए? शिक्षा में अव्वल रहने वाली लडकियां नौकरी में क्यों पिछड़ जाती हैं? ये आंकड़े केवल आर्थिक रूप से ही नहीं बल्कि सामाजिक रूप से भी महत्वपूर्ण हैं और चिंतित करने वाले हैं.




जहां सरकार महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की हर संभव कोशिश कर रही है, महिलाओं का कौशल विकास कर रोज़गार के अवसर पैदा कर रही है, महिलाओं को नौकरी में तमाम तरह की सुविधाएं दे रही हैं, सुरक्षा के लिए भी क़ानून बना रही है तो ऐसे में यह सवाल उठना बहुत ही स्वाभाविक है कि आखिर नौकरीपेशा महिलाओं की संख्या में कमी क्यों हो रही है?

Aadhi Aabdiआजकल लड़कियों की शिक्षा में भी अभिभावक उतना ही निवेश करते हैं, जितना निवेश वे अपने बेटे की पढाई में करते हैं. एक कुशल मानवश्रम बनने के स्थान पर इतनी प्रशिक्षित स्त्रियां घर पर ही रुक जाएं, तो यह सरकार और समाज दोनों के ही लिए चिंता का विषय है.

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जहां परम्परावादी चिन्तक इस बात से खुश हैं कि महिलाओं की नौकरी में रूचि कम हो रही हैं, और वे इस बात का हर्ष मना रही हैं कि लड़कियां वापस परिवार की तरफ लौट रही हैं, तो ऐसे में कई प्रश्न उठते हैं?

सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या लड़कियां अपने मन से नौकरी छोड़ रही हैं? क्या परिवारों में कुछ ऐसा हो रहा है जिससे महिलाएं नौकरी के स्थान पर घर पर रहना पसंद कर रही हैं? क्या और कोई विकल्प न होने के कारण वे ऐसा कर रही हैं?

आज भी समाज में घर चलाने के लिए पैसा कमाने की पूरी जिम्मेदारी केवल और केवल पुरुष की ही मानी जाती है और यह भी माना जाता है कि यदि पुरुष की कमाई ठीक ठाक है तो स्त्री को घर से बाहर निकलने की क्या जरूरत है. और दूसरा यह कि अभी भी उसका कार्यक्षेत्र केवल और केवल घर और घर की जिम्मेदारी है और बच्चे की जिम्मेदारी है.

Aadhi Aabdiऐसे में वे कौन से कारण हैं जो स्त्रियों को घर पर ही कैद कर रहे हैं? जहां तक भारत की बात है तो यह कहना गलत होगा कि भारत में स्त्रियां केवल गृहकार्य तक ही सीमित थीं. किसानों के साथ खेत के कामों में हाथ बंटाते हुए चित्र अभी भी कई संग्रहालयों का हिस्सा हैं.

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ऐसे ही स्त्रियों को शास्त्र और शस्त्र दोनों की एक समाज शिक्षा के भी उदाहरण भारतीय परम्परा में मिलते हैं. ऐसे में यह कहना कि स्त्री की भूमिका केवल घर तक ही सीमित थी, यह भारतीय परम्परा और स्त्री दोनों के साथ अन्याय होगा और एक प्रकार की गलत व्याख्या होगी. मगर गलत व्याख्याओं के साथ आज स्थिति बहुत अलग हो गयी है.

आज रोज़गार का अर्थ केवल नौकरी तक ही सीमित हो गया है. जबकि घटते हुए संयुक्त परिवार परम्परा में आज स्त्री के लिए सुबह नौ से शाम छह बजे की नौकरी करना संभव नहीं रह गया है. आज जहां न केवल महानगरों का विस्तार हो रहा है, बल्कि शहर भी गावों तक विस्तृत होते जा रहे हैं और दूरी परस्पर बढ़ती जा रही है.

ऐसे में मां बनने के बाद एकल परिवार की स्त्रियों के सामने दो ही विकल्प होते हैं या तो नौकरी छोड़ दें या फिर बच्चे को क्रेच में छोड़ दें. बच्चे को क्रेच में छोड़ने पर और उचित पैसे देने पर भी इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि बच्चे की देखभाल सही से होगी ही.

परिवार और घरेलू कार्य की जिम्मेदारी के चलते महिलाएं या तो नौकरी स्वीकार नहीं करतीं हैं या फिर छोड़ देती हैं, जैसा कि ‘हार्वर्ड केनेडी स्कूल’ के शोधकर्ताओं की एक टीम ने युवा और एकल महिलाओं पर किए गए अध्ययन ‘एविडेंस फॉर पॉलिसी डिजाइन-2016’ में पाया है.

जहां एक तरफ पारिवारिक घटक और कारण जिम्मेदार हैं तो दूसरी तरफ महिला सुरक्षा भी ऐसा ही एक कारण है जिसके चलते लडकियां घर से बाहर निकलने से परहेज करती हैं. दूसरी तरफ कई कम्पनियां ऐसी हैं जो सुरक्षा कारणों से महिलाओं को नियुक्त ही नहीं करती हैं.

सुरक्षा के साथ शादी भी ऐसा ही मसला है जिसके कारण कई कम्पनियां लड़कियों को नियुक्त करने से बचती हैं. कई बार लड़कियों से यह प्रश्न साक्षात्कार के दौरान ही पूछा जाता है कि क्या आप शादी के बाद नौकरी जारी रखेंगी? शादी के बाद क्या आप यह शहर छोड़कर तो नहीं जाएंगी?

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इसी के साथ बुनियादी ढांचों की कमी भी ऐसी ही एक समस्या है. महिलाएं भी कई बार उन्हीं कामों को चुनना पसंद करती है जो परम्परागत रूप से महिला उन्मुख’ हैं. उदाहरण के लिए सौंदर्य और स्वास्थ्य क्षेत्र. कई बार सामाजिक मानदंड भी महिलाओं के लिए रोजगार को सीमित कर देते हैं.

ऐसे में महिलाओं के लिए एक ही उपाय सामने आता है और वह है कौशल विकास क्योंकि तेजी से विकास वाले क्षेत्रों मेंअधिकांश नौकरियों पर पुरुषों का प्रभुत्व है. महिलाओं को अर्थव्यवस्था का मजबूत हिस्सा बनाने के लिए उनका रोजगारोन्मुखी होना आवश्यक है, मगर समय की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए.

उनके लिए ऐसे अवसरों की तलाश की जानी चाहिए जहां पर वे अपने समय के अनुसार प्रतिभा का प्रयोग कर सकें. नहीं तो Aadhi Aabadi की प्रतिभा का प्रयोग देश हित में नहीं होगा तो यह किसी भी देश के लिए दुर्भाग्य होगा. हमें स्त्रियों को न केवल शारीरिक सुरक्षा बल्कि मानसिक सुरक्षा भी दिए जाने की आवश्यकता है.

(साभार-फेसबुक वॉल)

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