MANJUBEN-हाईवे पर सड़कों से बातें करता है गुज़रता है उनका ट्रक

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Manjuben
Manjuben , Women truck driver

संजय जोशी:

दिल्ली और गुजरात के बीच दौड़ती हाईवे पर जब Manjuben अपना ट्रक लेकर गुज़रती हैं तो अब पुरुष ट्रक ड्राइवर्स को वैसा अचरज नहीं होता जो पहले हुआ करता था. अब मंजूबेन भी इन सड़कों और अपने ट्रक का एक अहम हिस्सा बन गई हैं. वे एक मालवाहक ट्रक ड्राइवर हैं और अपना यह काम उन्हें बहुत पसंद है.




तकरीबन चालीस साल की मंजू बेन शकलसूरत से मजबूत कद काठी वाली किसी पुरुष ड्राइवर जैसी दिखती है. उन्हें ड्राइवरी करना, घूमना फिरना और खूब पैसे कमाना बहुत पसंद है. अपने काम में भी वो किसी नौकर की तरह नहीं बल्कि स्वतंत्र हैसियत वाली एक बुद्धिमान और साहसी व्यवसायी दिखती है.




रुढिवादी परंपरा को तोड़ते हुए वे इस तरह के पेशे में जिसे पुरुषों का पेशा माना जाता था. मंजू कहती हैं कि यह धंधा उन्होंने किसी मजबूरी में नहीं बल्कि अपनी स्वंतंत्र चेतना के वास्ते अपनाया है.




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16 साल की छोटी उम्र में शादी होने के बाद अपनी निजता को बचाए रखने के लिए उन्होंने शादी तोड़ दी. यह शादी तोड़ने का उन्हें कोई ग़म नहीं है. उनका कहना है कि स्वतंत्र बने रखने के अहसास की वजह से उन्होंने यह निर्णय लिया.

उनके लिए स्वतंत्र रहना और हर रोज हर दुनिया को खोजना सबसे अहम है इसलिए अपनी छुट्टियों में भी वे इसे पूरी तरह जीती हैं. छुट्टियां होने पर वे जीप या मोटर साईकिल लेकर निकल जाती हैं अपनी दोस्तों के साथ घूमना पसंद करती हैं.

मंजू बेन की इसी शख्यिसत को दुनिया के सामने ले कर आई हैं श्रेरना दस्तूर अपनी फिल्म ‘Manjuben Truck Driver’ के जरिए. दस्तावेज़ी सिनेमा के जरिये महिला स्वर की पहचान करनी हो तो श्रेरना दस्तूर की फ़िल्म ‘मंजू बेन ट्रक ड्राइवर’ उसका एक जीवंत उदाहरण है.

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फ़िल्म की पूरी कहानी या तो मंजू बेन की ट्रक ड्राइवरी या उनके मोटर साइकिल चलाने के इर्द –गिर्द बुनी गयी. जब वे ट्रक नहीं चला रही होती हैं तो अपने दूसरे हमपेशे लोगों की तरह से इस धंधे से जुड़ी जगहों पर घूमती–फिरती नजर आती हैं.

फ़िल्म में बहुत कम संवाद हैं लेकिन फ़िल्मकार ने उनकी ट्रक ड्राइवरी के कार्य को उनकी स्वतंत्र चेतना से जोड़ कर बहुत अच्छी तरह से पकड़ने का प्रयास किया है. पूरी फ़िल्म में कहीं से यह भाव नहीं है कि हाय कोई औरत मजबूर होकर यह काम कर रही है और न ही यह भाव कि वह कोई अजूबा कर रही है.

52 मिनट की इस ट्रक यात्रा में एक अलग तरह की औरत की दुनिया के कई सफ़र दिखाई देते हैं और जो सबसे खास बात है वह यह कि इसे देखते हुए कोई यात्रा हमारे खुद के अन्दर भी शुरू हो पाती है.

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