तालियां बज रही थीं वो झूठ से लड़ रही थी

249

 

नीतू सिंह:

Best female anchor का अवार्ड लेते वक्त आडिटोरियम तालियों से गूंज रहा था, सबसे पहली सीट पर बैठे पापा-मम्मी और छोटी बहन भी तालियां  बजा रहे थे. अवार्ड के ऐलान से पहले संयोजक भूमिका बांध रही थी- ये अवार्ड एक ऐसी महिला पत्रकार और एंकर को जिसनें महिलाओं को एक नई दिशा देने में अहम भूमिका निभाई, हिम्मत दी, वो महिलाओं की ताकत और आवाज़ बनीं. उनके प्रोग्राम्स को देखकर अब महिलाएं अपनी आवाज़ बुलंद कर रही हैं, घर में भी और घर के बाहर भी. तालियों की गड़गड़हाट देर तक सुनाई देती रही. अवार्ड देने के लिए केन्द्र सरकार की एक काबीना मंत्री और मुंबई से आई सुपर स्टार फिल्म एक्ट्रेस थीं.




फोटोग्राफर्स और वीडियो कैमरापर्सन्स उसे अवार्ड के साथ मुस्कराने के लिए कह रहे थे, उसके चेहरे पर भी मुस्कराहट थी लेकिन सिर्फ दिखाने भर के लिए. दिल में कहीं कुछ कुरेदा हुआ महसूस हो रहा था. अवार्ड लेते हुए उसने मम्मी पापा की तरफ देखा, उनके चेहरे पर खुशी थी, गर्व का भाव था, लेकिन जब आंखें मिलीं तो शायद बिना कुछ कहे सब कुछ कह दिया गया हो. अवार्ड के बाद उसने सिर्फ़ इतना कहा कि महिलाओं को मैंने आवाज़ नहीं दी, उन महिलाओं से मुझे ताकत मिली है, पहचान मिली है, उन सब को इस समर्थन के लिए शुक्रिया .




पहली लाइन में ही दूसरी तरफ चैनल के ब़ॉस बैठे थे, उनके पास पहुंची अवार्ड देने के लिए तो लगा कि अब रुलाई फूट जाएगी. सब्र का बांध टूटता सा लगा, लेकिन उनका स्नेह भरा हाथ मरहम सा लगा. बॉस और उनके साथ आए दो साथिय़ों ने बधाई दी. साथ ही और लोग आ आकर बधाई दे रहे थे, खासतौर से लड़कियां और समारोह में देश भर से आई वे गांव देहात की महिलाएं, जिन्होंनें अपने-अपने इलाके में महिलाओं के लिए बड़ा काम किया था और उनके लिए मैंने सेक्स, ग्लैमर और गॉसिप से भरे रहने वाले न्यूज चैनलों में जगह बनाने की कोशिश की थी.




बॉस ने जब पहली बार मीटिंग में कहा था कि मैं महिलाओं की आवाज़ को ताकत देने वाला एक प्रोग्राम चाहता हूं जो सिर्फ फीमेल एंकर करे  जो महिलाओं की तकलीफ को गहराई से समझती हो .इसे हम फैशन और ग्लैमर का शो नहीं बनाना चाहते और ना ही महिलाओं के नाम के शो की औपचारिकता पूरा करना चाहते हैं. एक ऐसा शो जिसे देखकर हर औरत को लगे शायद इसमें कहीं ना कहीं उसकी आवाज़ है, उसकी दबी हुई इच्छाएं हैं, उसके खिलाफ हुई हिंसा है, तकलीफें हैं. वो इससे अपना जुड़ाव महसूस कर सके. बात पूरी करते करते उन्होंनें उसकी तरफ देखा-क्या आप करना चाहेंगीं, वह तो माने सपने से टूटी. उसे अंदाज़ा ही नहीं था कि उसका नंबर आएगा. चार साल तो हो गए थे उस चैनल में काम करते-करते, लेकिन सवेरे के या फिर देर रात के बुलेटिन करने के अलावा कोई मौका ही नहीं मिला. इससे भी ज़्यादा बड़ा झटका लगा उन दो फीमेल एंकर्स को, जो इस अंदाज़ में हमेशा रहती थीं कि उनसे ही चैनल चलता है.  उसने बिना सोचे-समझे एक पल गंवाए हां कर दिया .

मीटिंग ख़त्म होने के बाद कैफेटरिया में बहुत से साथी मज़ाक उड़ाने के अंदाज़ में बात कर रहे थे, लेकिन उसकी चिंता कुछ और थी. अपने घर और ससुराल को लेकर. वह सीधे बॉस के केबिन में पहुंची, कहा- कुछ बात करना चाहती हूं आपसे शायद मुझसे नहीं हो पाएगा ये शो. उन्होंने हैरानी से पूछा–क्यों, तुम तो बहुत अच्छा बुलेटिन करती हो. यह सुन कर वह नम होती आंखों को चुपके से पोंछते हुए कुर्सी पर बैठ गई.

क्या हुआ, कोई निजी परेशानी? बॉस के इस सवाल ने दिल के अंदर चल रहे तूफान का दरवाज़ा खोल दिया. सर नहीं हो पाएगा, कैसे बताऊं. मेरी हिम्मत ही नहीं सर, ऐसा शो करने की .

क्या हो गया , यदि तुम्हारी कोई परेशानी है तो बताओ ?

दिमाग में हलचल थी, कि क्या बताए या नहीं? सर, घर पर परेशानी होगी …बोलते बोलते पांच साल पीछे लौट गई. तीन साल के प्यार के रिश्ते के बाद रवि ने उससे शादी का प्रस्ताव रखा. दोनों ने ही साथ साथ जर्नलिज्म का पीजी कोर्स किया था, लगता जैसे रवि हमेशा इस पक्ष में था कि महिलाओं को खुली हवा मिलनी चाहिए. वह उसके इस विचार पर मर उठी थी और शादी के प्रस्ताव को मना नहीं कर पाई. शादी के लिए उसके घर वाले तैयार नहीं थे, फिर भी शादी हो गई.

शादी के तीन महीने बाद ही प्रेंगनेंसी हुई तो रवि के नाराज़ मां बाप भी साथ आ गए, लेकिन उनके आते ही घर के माहौल के साथ रवि का बर्ताव भी बदलने लगा. अब वो हर बात पर उसे डांटता. मां का पक्ष लेता. उसे चैनल की नौकरी छोड़ने का आदेश दे दिया गया. वह बहुत रोई–गिड़गिड़ाई, बड़ी मुश्किल से रवि माना. सिर्फ मॉर्निंग शिफ्ट में सुबह आठ से पांच बजे तक की ड्यूटी कराने पर राजी हो गया, यानी चैनल के बहुत से मौके मुझे खोते लगे. जबकि वह खुद भी एक न्यूज चैनल में काम करता था और उस पर ऐसी कोई बंदिश नहीं थी. फिर जब कृति पैदा हुई तो लगा मानो कोई गंभीर पाप कर दिया हो उसने.

रवि ने एक बार भी बेटी को प्यार से नहीं देखा, उसके माथे पर हाथ नहीं फेरा. रवि की मां हॉस्पिटल के बेड के पास बैठकर उसे गालियां दिए जा रहीं थी. वे कह रही थीं ऐसी बदनसीब बहू हमें ही नसीब होने थी, हमने पहले ही मना किया था. कृति के जन्म की खबर सुनकर उसके मम्मी पापा आ तो उन्हें भी मिलने नहीं दिया गया और बदसलूकी की गई

वह हैरान थी कि पापा उससे मिलने क्यों नहीं आए? बेटी पैदा होने के कारण घर आने के बाद उसे इतना कोसा गया कि वह मां बनने की खुशी ही भूल गई. कृति का मासूम चेहरा भी उसके दिल के जख्मों पर मरहम नहीं दे पाता. छह महीने तक मुझे किसी से बात नहीं करने दी गई. रवि सीधे तरीके से बर्ताव हीं नहीं करता. जब दोबारा से चैनल में ड्यूटी ज्वॉइन की तो कहा गया कि कोई होशियारी मत दिखाना, जुबान खोलने की हिम्मत मत करना. कभी-कभी पापा मम्मी आते तो सास या रवि साथ में ही बैठे रहते. वे लोग आंखों में ही समझते अपनी बेटी की तकलीफ. बस कहने भर को जिंदा थी और कर रही थी एंकर की नौकरी.

आज भी अवार्ड फंक्शन में कोई नहीं आया था ससुराल से, रवि भी नहीं, उसने कह दिया कि मेरे पास वक्त नहीं है, ऐसे फालतू के प्रोग्राम के लिए वह कुछ कह नहीं सकी .

अवार्ड हाथ में था पर खुद को धिक्कारने का मन कर रहा था, खुद से ही आंख मिलाने की हिम्मत नहीं. गांव देहात की वे औरतें, जिन्हें हम अनपढ़ गंवार मानते हैं वो घर परिवार और समाज से लड़कर अपनी दुनिया को रोशन कर रही हैं और वह सिर्फ उनके नाम पर अवार्ड ले रही है. एक झूठ का अवार्ड.. जो खुद पर अत्याचार के खिलाफ नहीं बोल सकती वो क्यों हो अवार्ड की हक़दार.

तालियां अब भी बज रही थीं और फोटो के फ्लैश चमक रहे थे..